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बुजुर्गों पर ध्यान दे सरकार !!

बुजुर्गों पर ध्यान दे सरकार

दिल्ली के अखबारो ने एक बुजुर्ग के अपनी मृत पत्नी के साथ तीन दिन तक रहने की खबर आजकल सुर्ख़ियों में है।ये घटना बुजुर्गो में बढ़ते अकेलेपन और समाज की उनके प्रति घटती चिंता को बड़े दर्दनाक अंदाज में बयान करती है।

बुजुर्गों की संख्या देश में लगभग 10 करोड़ हो गई है लेकिन इनके प्रति सर्कार कोई कल्याणकारी कदम उठाने में गंभीर नहीं दिख रही। आये दिन बुजुर्गों के प्रति हिंसा और भेदभाव की खबरें अखबारो का हिस्सा बनती हैं और हम उन्हें पढ़कर भूल जाते हैं।

बुजुर्गों की बढ़ती समस्याओं पर तुरंत गंभीर कदम उठाये जाने की जरुरत है।अल्जाइमर, डिमेंशिया और डिप्रेशन जैसी बीमारियों से झूझते बुजुर्गो को राहत पहुँचाने में परिवार, समाज, गैर सरकारी संस्थाओं और सरकार सबकी अहम् भूमिका है।जिस देश का कानून बनाने वाले अधिकतर लोग बुजुर्ग हो वहाँ बुजुर्गों के प्रति उनका उदासीन रवैया टीस पैदा करता है।

बुजुर्गों के स्वास्थ्य सुविधाएं, सुरक्षा और अनुकूल वातावरण मुहैया कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

मनीषा झा

ये कैसी मानसिकता??

ये कैसी मानसिकता??

हरियाणा की बीजेपी सरकार में मंत्री अनिल विज द्वारा महात्मा गाँधी पर की टिप्पणी आजकल के राजनेताओ की मानसिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।

महात्मा गाँधी भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व के लिए आदरणीय हैं और वर्तमान में भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने आज़ादी के समय थे। पराधीन भारत में विदेशी वस्तुओं की होली जलाकर खादी को बढ़ावा देना केवल बाजार की रणनीति नहीं थी बल्कि पूरे ब्रितानिया को एक मजबूत सन्देश देना था।


हाल ही में मोदी जी द्वारा डायरी और कैलेंडर के लिए चरखे कातते हुए खिंचाई गई तस्वीर पर हुए विवाद पर दी गई अनिल विज की टिप्पणी कि बापू के कारण खादी को नुकसान हुआ  स्वार्थी मानसिकता का परिचायक है जो अपने सियासी फायदे के लिए किसी भी हद तक गिर सकती है।


सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगो के ऐसे बयानों पर क़ानूनी कार्यवाही होनी चाहिए ताकी राजनीति में एक न्यूनतम अनुशासन बचा रह सके।
जहाँ एक और अपने साथ हो रहे अन्याय को सोशल साइट्स के माध्यम से उठाये जाने पर सैनिको पर कार्यवाही हो रही है वहीँ दूसरी और नेता अपनी सब मर्यादाएं लाँघ शर्मनाक बयान दे रहे हैं। संविधान ने केवल नेताओ को ही अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं दी है बल्कि हर नागरिक इस आज़ादी का हक़ रखता है।

मनीषा झा